सचिन श्रीवास्तव , लखनऊ ||
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के मानदेय में बढ़ोतरी के फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने अप्रैल 2026 से शिक्षामित्रों का मासिक मानदेय 10,000 रुपये से बढ़ाकर 18,000 रुपये करने का निर्णय लिया है। इस फैसले से लगभग 1.43 लाख शिक्षामित्रों को लाभ मिलने की बात कही जा रही है। वहीं अनुदेशकों का मानदेय भी 9,000 रुपये से बढ़ाकर 17,000 रुपये कर दिया गया है।
सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और शिक्षकों का मनोबल बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
विपक्ष का सरकार पर हमला
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस फैसले पर सरकार को घेरते हुए इसे राजनीतिक दबाव का परिणाम बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि लंबे समय से शिक्षामित्र अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे थे और अब चुनावी माहौल में सरकार ने मानदेय बढ़ाने का निर्णय लिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार शिक्षामित्रों के हित में गंभीर है, तो पिछले वर्षों का बकाया भुगतान भी किया जाना चाहिए।
वोट की अपील और राजनीतिक बयानबाजी
अखिलेश यादव ने शिक्षामित्रों से अपील करते हुए कहा कि वे अपनी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाएं। उन्होंने दावा किया कि पिछली सरकार के दौरान शिक्षामित्रों को अधिक मानदेय मिलता था और वर्तमान बढ़ोतरी को पर्याप्त नहीं बताया।
सरकार बनाम विपक्ष – अलग-अलग दावे
सरकार इस फैसले को राहत और शिक्षा सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे आगामी चुनावों से पहले लिया गया निर्णय बता रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षामित्रों का मुद्दा लंबे समय से राज्य की राजनीति में अहम रहा है और आने वाले चुनावों के मद्देनजर इस विषय पर बहस और तेज हो सकती है।
चुनावी माहौल में बढ़ी चर्चा
मानदेय बढ़ोतरी का यह निर्णय ऐसे समय आया है जब राज्य में चुनावी तैयारियां तेज हो रही हैं। ऐसे में शिक्षामित्रों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बने रहने की संभावना है।


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