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Tuesday, March 23, 2021

सिद्धार्थनगर --बलिदान दिवस पर विशेष

 

डॉ अजय कुमार, 

राजकीय महाविद्यालय डुमरियागंज 

भारतीय इतिहास में 23 मार्च का दिन नि: संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण है।  इसी दिन 1931 ई को महान क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु  फांसी की सजा दी गई थी । इस बलिदान दिवस के अवसर पर इन महान क्रांतिकारी को  राजकीय महाविद्यालय डुमरियागंज सिद्धार्थ नगर के समस्त छात्र-छात्राओं एवं महाविद्यालय परिवार के तरफ से कोटि कोटि नमन एवं श्रद्धांजलि।


23 मार्च का दिन आते ही  भारतीय जनमानस का कोई भी ऐसा व्यक्ति न हो, जिसके आंखों में आसूं न  आए, नि संदेह यह दिन महान त्याग, बलिदान , देश के प्रति समर्पण एवं क्रांतिकारी आंदोलन के महत्ता को बताता है।  भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष की चार प्रवृत्तियों का उल्लेख मिलता है।

पहली प्रवृत्ति, भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव के फलस्वरूप  1885-1905 ई तक उदारवादी या नरम पंथी आंदोलन के संघर्ष की विचारधारा का प्रभाव दिखता है। उदारवादी विचारधारा के प्रमुख नेताओं में दादा भाई नौरोजी  या  grand old man of India, फीरोज़ शाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले  , सुरेन्द्र नाथ बनर्जी आदि प्रमुख रहे। उदारवादी लोग अंग्रेजी शासन के तहत  अनुनय विनय के माध्यम से भारतीय जनमानस की समस्यायों का समाधान करना चाहते थे। इनकी प्रमुख मांग थी; सिविल सेवा परीक्षा में भारतीयों को रियायत, भू राजस्व के दरों में कटौती, प्रेस की स्वतंत्रता , न्यायालय के बकायें मुद्दे को सुलझाने आदि रहा।

1892 ई के अधिनियम से भारतीयों में निराशा, 1905 ई में लार्ड कर्जन के द्वारा किया गया बंगाल विभाजन जैसे कार्यों ने भारतीय जनमानस में निराशा उत्पन्न की । इसी के परिणामस्वरूप  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उग्रवादी विचारधारा का उद्भव हुआ । उग्रवादी विचारधारा का प्रभाव  1905-1920 ई तक रहा, इसके प्रमुख नेताओं  में बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय ,विपिन चन्द्र पाल और अरविंद घोष प्रमुख रहे। उग्रवादी विचारधारा के लोगों का कहना था कि अनुनय विनय की नीति से हमें कुछ भी  हासिल नहीं होने वाला है । ये लोग हड़ताल , बहिष्कार के माध्यम से स्वराज की प्राप्ति करना चाहते थे। इसीलिए बाल गंगाधर तिलक ने नारा दिया: स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और इसे हम लेकर रहेंगे।

1919 ई के माटेग्यूं चेम्सफोर्ड सुधार से निराशा और 1920 ई में बाल गंगाधर तिलक की आसमयिक  मृत्यु ने इस आंदोलन को असफल कर दिया।

1920 ई से 1947ई तक स्वतंत्रता आंदोलन में इतिहास में गांधीवादी युग के नाम से जाना जाता है।  गांधीवादी विचारधारा  अन्याय, शोषण एवं सामाजिक वैमनस्य के खिलाफ सत्य , अहिंसा और  सत्याग्रह के माध्यम से  संघर्ष करने को प्रेरित किया।

चौथा विचारधारा क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में उभरी , जिसका प्रतिनिधित्व सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु , सावरकर , चन्द्र शेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह , लाला हरदयाल  आदि ने किया।  क्रांतिकारी आंदोलन के नायकों का मुख्य उद्देश्य हिंसा के माध्यम से औपनिवेशिक शासन का अंत करके भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाने चाहते थे। 

क्रांतिकारी   आंदोलन खून के बदले खून के सिद्धांत पर आधारित था। अर्थात हिंसा एवं रक्तपात के माध्यम से  भारतीय स्वतंत्रता इस आंदोलन मुख्य उद्देश्य था। इस आंदोलन के उद्भव हेतु निम्न परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है:

1, उदारवादी और उग्रवादी आंदोलन की असफलता।

2,  गांधीजी के द्वारा  चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन को  स्थगित करना।

3, 1917 ई की रुस की बोल्शेंविकं क्रांति की सफलता, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने  निरंकुश जारशाही शासन के खिलाफ हिंसात्मक गतिविधियों के माध्यम से जारशाही शासन का अंत किया था।

4,   सरदार भगत सिंह, चंदशेखर आजाद, अरविंद घोष ,  राम प्रसाद बिस्मिल  , बटुकेश्वर दत्त आदि व्यक्तित्व उद्भव।


आज बलिदान दिवस है।23 मार्च 1931ई को महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु  असेम्बली कांड की घटना के बाद लाहौर षड्यंत्र के तहत फांसी की सजा सुनाई गई। इन तीनों को असेम्बली कांड का अभियुक्त माना गया। महान क्रांतिकारियों को नमन करते हुए भावपूर्ण श्रद्धांजलि, जिन्होंने देश की आजादी के लिए प्राणों की आहुति दी।

सरदार भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर में हुआ था। इनके पिता सरदार किशनसिंह और चाचा सरदार अजीतसिंह भी क्रांतिकारी रहे। सरदार भगत ने नौजवान सभा नामक क्रांतिकारी संगठन बनाया था, इनके उपर लेनिन का प्रभाव था।

सुखदेव का जन्म 15 मई  1907 ई को पाकिस्तान के लायलपुर में हुआ था। सरदार भगत सिंह का घर इनके पड़ोस में था, ये दोनों स्कूली मित्र भी थे। राजगुरु का जन्म 24अगस्त 1908 ई को पुणे के खेड़ा नामक स्थान पर हुआ था,इन पर शिवाजी के छापामार पद्धति का प्रभाव था।

उपर्युक्त तीनों क्रांतिकारियों को असेम्बली कांड का अभियुक्त माना गया और फांसी की सजा दी गई। अब प्रश्न उठता है कि गांधी जी ने इनकी फांसी की सजा को माफ कराने में  गांधी जी असफल क्यो रहे?


इरविन के साथ समझौते में इसका प्रयास क्यो नही किया?

इसका उत्तर गांधी जी के लेख , यंग इंडिया में लिखा गया था, उसमें लिखा है कि गांधी जी सरदार भगत सिंह के बहादुरी एवं उद्देश्यों का कायल हैं, परंतु स्वतंत्रता के लिए सरदार भगत सिंह ने जो माध्यम चुना,वह गलत था। कहने का तात्पर्य है कि गांधी जी सत्य अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ संघर्ष करते थे, जबकि सरदार भगत सिंह हिंसा का सहारा लेते थे।

महान क्रांतिकारियों को बलिदान दिवस पर पुनः नमन।




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