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Thursday, April 12, 2018

आज जी कर रहा है की कहीं तन्हाई में चला जाऊं और चीख़ चीख़ कर रो लूँ की शायद दिल को थोड़ा सुकून मिल जाए




चुनावी भाषणों में शेर की तरह दहाड़ कर जनता से मुखातिब होने वाले शासक के शासन में देश की बहन बेटियाँ गीदड़ों की दरिंदगी का शिकार होने लग जाएं तो समझ लीजिये की आपने जो शासक चुना है वो बिल्कुल भी इस लायक़ नहीं था की उसके हाथों में देश की जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंप दी जाती। चार साल के उनके शासनकाल में देश की आम जनता ने जो दुख भोगा है और जो कुछ भोग रही है और जैसे हालात का सामना कर रही है इसका अंदाजा उन्हें भी नहीं रहा होगा जिन्हें शुरुआत के दिनों से ही इस सरकार में ऐसे हालातों की कल्पना कर ली थी।


महिला सुरक्षा के मुद्दे को मुख्य हथियार की तरह इस्तेमाल करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देने वाली पार्टी के राज में महिला सुरक्षा की स्थिति दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है। बलात्कार तो बलात्कार बलात्कार के बाद भी सिस्टम की आबरू से खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा है और 56 इंची छाती का दंभ भरने वाले विकास-पुरूष अर्थात 125 करोड़ लोगों के प्रधानसेवक/रखवाले हाथ पर हाथ धरे सारा तमाशा इतनी खामोशी से देख रहे हैं की जैसे उन्हें कुछ पता ही ना हो की उनकी सरकार में उन्नाव से लेकर कठुआ तक दरिंदों के हौसले किस हद तक़ बढ़ चूके हैं।



कठुआ की मासूम बेटी के साथ हुए दरिंदगी के चर्चे सात समंदर पार अमेरिका तक पहुंच गये पर दिल्ली के हुकमरानों के कान में जूं तक नहीं रेंगी की एक बार भी कोई जिम्मेदार सामने आकर इतना बस कह सके की इस जघन्य हत्या और बलात्कार के मुजरिमों का बख़्शा नहीं जाएगा,  इसे बेशर्मी की इंतेहा ही समझा जाए की जिम्मेदारों ने इतने गंभीर मसले पर भी इतनी सी औपचारिकता पूरी करना भी मुनासिब नहीं समझा। बात बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानसेवक जी के शब्दों का अकूत भंडार भी ऐसी घटनाओं के वक़्त एक दम खाली हो जाता है जैसे की ये सारे शब्द 8 लाख़ 50 हज़ार शौचालयों का बखान करते करते खत्म से हो गये हों।

उन्नाव के बलात्कार की घटना भी कम चौंकाने वाली नहीं है सत्ताधारी विधायक का आरोपी के तौर पर नाम आते ही जिस तेजी से विधायक जी के लिये राहत और बचाव कार्य की सरकारी चकरी घूमी है की देखने वाले दंग रह गये नतीजा बलात्कार पीड़िता के पिता की पुलिस कस्टडी में ही मौत हो गयी।



अपराधियों को एनकाउन्टर का खौफ़ दिखाकर उन्हें क़ानून का पाठ पढ़ाकर वाहवाही लूटने वाली सरकार अपने ही विधायक को ये सबक नहीं सिखा पाई और नतीजा देश के सामने है। उत्तर प्रदेश चुनावों में अखिलेश सरकार के कारनामे गिनाने वाले लोग अपनी सरकार आने पर काम और कारनामों के बीच का अंतर लगभग भूल चूके हैं और शायद कारनामों को ही काम समझ बैठे हैं।

देश की भोली भाली जनता के इस सब्र की भी दाद देनी होगी की ये वही जनता है जिसने निर्भया के लिये सड़कों पर उतरकर मौजूदा सरकार की हालत खराब कर दी थी जिसने पूलिस की बर्बर लाठियों और ठंडे पानी की बौछारों के बावजूद  निर्भया के लिये इंसाफ़ की लड़ाई जारी रखी थी पर आज इसे राष्ट्रवाद की ऐसी अफीम पिला दी गयी है की अब वो सही और गलत के लिये सड़कों पर उतरकर लड़ाई लड़ना तो दूर मूंह से कुछ बोलना भी भूल चुकी है........... अब उसे हर चीज़ में सिर्फ़ हिंदू और मुसलमान नज़र आता है दलित और आरक्षण नज़र आता है। अब उसकी हर बहस चाहे वो कितने भी जरूरी मुद्दे पर हो हिंदु और मुसलमान और जाति के जंजाल में फंसकर दम तोड़ देती है। उसकी ज़हनियत में नफ़रत का इतना ज़हर घोल दिया गया है की अब उसे रोज़गार, भृष्टाचार, महिला सुरक्षा और विकास जैसी चीजों से कूछ लेना देना ही बाक़ी नहीं बचा है, अब बस बचा है तो हिंदू और मुसलमान की तीख़ी बहस, आरक्षण की बकैती और सबका साथ और सबका विकास वाली सरकार और उसके का(रना)मों की एक लंबी चौड़ी फेहरिस्त।

सुहेल सिद्दीकी , लखनऊ

Edited by....सचिन श्रीवास्तव

12।4।18

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